अष्टांग योग क्या है , इसका आचरण कैसे करे ?

अष्टांग योग क्या है , इसका आचरण कैसे करे ?

इस दुनिया में महान तपस्वी एवं सिद्ध योगी हुए ,जिन्होंने हमें योग की शिक्षा और परिणामों से अवगत कराया। "योग" का अर्थ होता है जोड़ना , जो हमें ईश्वर से जोड़े उसे योग कहा गया है।  आत्मा और परमात्मा के बिच मिलन करानेवाली कड़ी को योग कहा जाता है।  योग जीवन जीने की शैली, और मरने की कला है , जिसे मरना आ गया उसे जीने का तरीका भी अपने आप आ ही जाता है।

जितना हमें  इस बाहरी दुनियाँ में दिख रहा है , जैसे - चंद्र, सूर्य , तारे , गृह , नक्षत्र ,ये सारा ब्रम्हांड हमारे शरीर में ही है।  इस ब्रम्हांड से जुड़ने का तरीका ही योग कहलाता है। जो एक बार इससे जुड़ जाए, उसे किसी और से जुड़ने की आवश्यकता नहीं रहती।  जैसे जैसे समय बदलता गया , वैसे ही योग की परिभाषा भी बदलती गयी , कुछ भ्राँतिया उठने लगी ,विचार बदलते गए पर पुरातन काल से योग जैसा था ,वैसा आज भी है। आजकल हर कोई अपना जीवन सुखी ,स्वस्थ और आध्यात्मिक तरीके से जीना चाहता है । योग के प्राचीन ग्रंथ जैसे "पतंजलि , हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता , चरक संहिता " , इन सबमे प्राचीन काल की योगविद्या का  विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है।
प्रस्तुत लेख में योग के अंतिम चरण "अष्टांग योग " की जानकारी देने जा रहे है ,जिसे "राज योग"  के नाम से भी जाना जाता है।








Ashtanga Yoga In Hindi Pdf -   अष्टांग योग

Ashtanga Yoga In Hindi Pdf -   अष्टांग योग






  • राज योग या अष्टांग योग का परिचय 





  •  राज यानि राजा , जिसप्रकार कोई  राजा स्वतंत्र ,आत्मनिर्भर , पराक्रमी एवं आत्मविश्वासी होता है , उसीतरह "राज योगी" या "राज योग"  का अभ्यास करनेवाला साधक भी निर्भयता , आत्मविश्वास, साहस ,पराक्रम ,दृढ़ता  और शांति जैसे गुणों का स्वामी होता है।
  • संस्कृत शब्द "अष्टांग "  दो शब्दों से मिलकर बना है। (अष्ट = आठ ,अंग = भाग )
  • योग के अंतिम चरण "अष्टांग योग" में प्रमुख आठ अंगों का समावेश किया गया है। 
  • एक योगी या साधक के लिए इन सभी अंगों का पालन करना आवश्यक होता है। गुरु अपनी देखरेख में शिष्य का मूल्यांकन कर,  इन आठों अंगों का आवश्यकता अनुसार अभ्यास कराते है। 
  • अष्टांग के आठ अंगों में से कुछ अंग शिष्य में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहते है ,जिसका अभ्यास शिष्य जन्म से लेकर आजीवन अनायास ही करता चला जाता है। 
  • पर कुछ अंगों को आत्मसात करने के लिए शिष्य को कठिन साधना से गुजरना पड़ता है। तभी साधक की कुंडलिनी उर्ध्व गति प्राप्त कर ,साधक के मार्ग को प्रशस्त करती हुयी गंतव्य तक पहुँचाती है। 
  • गुरु के सानिध्य में की गयी साधना के दौरान शिष्य का अपने गुरु पर नितांत श्रद्धा होना आवश्यक है। 
  • साधना में कुछ ऐसे प्रसंग भी सामने आते है, जिसे साधक का मन करने से इनकार कर देता है। पर सच्चा शिष्य गुरु की आज्ञा शिरोधार्य मानते हुये पूर्ण विश्वास के साथ  गुरु के दिखाएं हुए मार्ग पर चल पड़ता है। और अंततः अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है। 
  • मैं जानता हु की आज के आधुनिक युग में लोगों के पास इतना समय नहीं हैं जिसमे वो इन आठ अंगों का अनुसरण एवं अभ्यास कर सके। 
  • पर कुछ ऐसे भी अंग एवं सूचनाएं है ,जिनके लिए अधिक समय की आवश्यकता नहीं है। जिसे हर कोई अपनाकर अपना जीवन सफल बना सकता है। 
  • कुछ लोगों के मन में यह बात जरूर उठेगी की हमारे पास तो कोई गुरु नहीं हमें प्रशिक्षित कौन करेगा ? क्या हमें सच्चे गुरु की तलाश करनी चाहिए ? 
  • इसके लिए अधिक परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। 
  • आजकल अधिकारी गुरु का मिलना अत्यंत दुर्लभ है। 
  • पर अगर आप अपने स्वयं के प्रति निष्ठावान और प्रामाणिक है तो आपको घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपके गुरु आपके अंदर बैठे है। आपको बस उनके दिखाए गए मार्ग पर आगे बढ़ना है।









अष्टांग योग के आठ अंग






  1.  यम- संयमित जीवन
  2.  नियम - योग के नियमो का पालन
  3.  आसन- शारीरिक व्यायाम
  4.  प्राणायाम - श्वासों का व्यायाम
  5.  प्रत्याहार - दूसरों की संप्पत्ति पर ध्यान न देना
  6.  धारणा - एकाग्रता शक्ति को बढ़ाना
  7.  ध्यान - ध्यान साधकर अपने मन को वश में करना
  8.  समाधी - पूर्ण आत्मानुभव होना







  • उपर बताये गए  ८ अंगों के प्रत्येक अंग में अलग अलग सूचनाओं का पालन करना पड़ता है।







१. यम  - संयमित जीवन  :-  


  • अष्टांग योग के प्रथम अंग "यम  " में  अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,ब्रम्हचर्य और अपरिग्रह इन पांच भागों का समावेश होता है।
  1. अहिंसा - हिंसा न करना -  इस भाग में हमें हिंसा करने से बचना होता है। किसी जीवित प्राणी,पशु -पक्षी  को मारना , कष्ट देना ,या किसी को मानसिक एवं शारीरिक रूप से कष्ट देना ये सभी बाते हिंसक प्रवृति को जन्म देती है। साधना के दौरान या अन्य समय ऐसा करने से साधक में तमोगुण की वृद्धि होती है जो आगे चलकर साधक के कल्याण में बाधा उत्पन्न करती है।
  2. सत्य - सत्य बोलना :-     इस भाग में साधक स्वार्थ एवं इच्छा की भावना त्यागकर केवल सत्य बोलता है। किसी भी परिस्थिति में असत्य बखान करना अपने निजी स्वार्थ को जन्म देता है , सत्य का अनुसरण करके ही ये योग सिद्ध होता है।
  3. अस्तेय - चोरी ना करना -  किसी वस्तु या कला की चोरी करना, मन में लालच और आसक्ति को जन्म देती है। इसलिए साधक को चाहिए की वो साधना के दौरान चौर्य कर्म (चोरी करने ) से बचे। 
  4. ब्रम्हचर्य -  ब्रम्हचर्य यानी "ब्रम्ह" के समान आचरण करने वाला, इस अंग में साधक को पूर्ण ब्रम्हचर्य का पालन करना पड़ता है।  इस योग में साधक को शारीरिक , मानसिक एवं शाब्दिक रूप से अपना आचरण शुद्ध एवं आदर्श रखना पड़ता है।
  5. अपरिग्रह -   जीवन जीने के लिए जितनी वस्तुए एवं धन की आवश्यकता है केवल उतनी ही वस्तुओं का संग्रह करना अपरिग्रह कहलाता है। इससे अधिक वस्तुओं का संचय आसक्ति जैसे विकारों को उत्पन्न करता है ,जो एक साधक के लिए बाधक है। मनुष्य अगर  इच्छाओं को संयमित कर पाए तो वो अपना संपूर्ण जीवन सुखी एवं आनंदी व्यतीत कर सकता है।






२. नियम - योग में दी गयी सूचनाओं एवं निर्देशों का पालन करना :-


  •  अष्टांग योग के दूसरे अंग "नियम" में दी गयी सूचनाएं एवं निर्देशों का प्रामाणिक और सजगता के साथ पालन करना पड़ता है। इस भाग का आचरण किये बिना साधक अपने इच्छित लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता ,अपने स्वयं के अस्तित्व की पहचान करने के लिए साधक के अंदर ,इस अंग में वर्णित निम्न गुणों का जागरण होना अति आवश्यक है।
  1. शौच - स्वच्छता-      आतंरिक मार्ग पर चलते हुए ,केवल अपने भौतिक शरीर का ध्यान रखना पर्याप्त नहीं है । बल्कि  साधक को चाहिए की वो अपने भौतिक शरीर के साथ साथ अपने मन के विकारों को पहचान कर उन्हें दूर करने का प्रयास करे।
  2. संतोष - संतोषी बने रहना -     असंतोषी मनुष्य जीवन में धन तो कमा लेता है, पर आंतरिक मार्ग से भटक जाता है। वो कभी अपने अस्तित्व को नहीं जान पाता । साधक को चाहिए की वो अपने मन को संयमित कर आजीवन संतोषी और समर्पित जीवन जिये। 
  3. तप - अपनी इन्द्रियों पर संयम रखना -   अपनी इंद्रियों को नियंत्रित रखते हुए  , मन को विभिन्न प्रकार के विचारो से हटाकर संयमित रखना ही तप कहलाता है।
  4. स्वाध्याय - अभ्यास करना -    प्रतिदिन वेदो और शास्त्रों को पढ़ना , "भगवत गीता" का अध्ययन करना , योगशिक्षा हेतु "हठयोग प्रदीपिका , पतंजलि योग सूत्र"   जैसी पुस्तकों का अभ्यास कर, अपने योग ज्ञान को बढ़ाना ही स्वाध्याय है।  साधक को हर रोज स्वाध्याय करते रहना चाहिए।
  5. ईश्वर प्रणिधान -ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखना :   अपना अंहकार छोड़कर मन ,कर्म और वचन से  ईश्वर के प्रति अपने सारे कर्म समर्पित कर देना ही "ईश्वर प्रणिधान" कहलाता है। एक साधक को चाहिए की वो गुरु की आज्ञा एवं निर्देशों का पालन करे ,और स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित रखे।





३. आसन - शारीरिक व्यायाम :-     





  • योग के इस चरण में साधक हो अलग -अलग प्रकार के "योगासन" करके शारीरिक रूप से मजबूत बनाया जाता है।  
  • इससे शरीर के अंदर मौजूद बीमारियां दूर होकर ,साधक आगे आनेवाले चरणों के लिए तैयार हो  जाता है।







४. प्राणायाम :- 



  • श्वासों का व्यायाम :    "कपालभाति , अनुलोम विलोम , नाड़ीशोधन " जैसे प्राणायामों का नित्य अभ्यास कर साधक के अंदर प्राणशक्ति को उजागर किया जाता है।
  •  जिससे साधक प्राणवायु को नियंत्रित कर मन को साधने के लिए सक्षम बनता है। 





५. प्रत्याहार :- 


  • दुसरो की संपत्ति पर ध्यान न देना :     
  •  इस चरण में साधक अपने मन को, बाहरी वस्तुओं से हटाकर  पूरी तरह अपनी आत्मा में लीन रहने का प्रयत्न करता है।  
  • अगर ये " योगाभ्यास " साधक सिद्ध कर ले, तो वो जब चाहे अपने मन को किसी भी स्थान पर एकत्रित कर सकता है।











६. धारणा- एकाग्रता :-       




  • धारणा योग में साधक अपना मन अपने विचारो , भावनाओं और बाहरी दुनिया से हटाकर किसी एक स्थान पर लगाने का अभ्यास करता है।  
  • इस अभ्यास के लिए वो त्राटक (एक जगह पर बिना पालक झपकाए ध्यान लगाना ) जैसी क्रियाओ का अभ्यास करता है।






७.  ध्यान - ध्यान लगाना  :-      

ध्यान - ध्यान लगाना  :-


  •   इसमें साधक को "ध्यान " लगाने का अभ्यास कराया जाता है। 
  •  ध्यान लगाना यानि नींद लेने की प्रक्रिया नहीं है , नींद तब आती है जब हमारे शरीर और दिमाग को थकावट होती है , पर ध्यान तभी लगता है, जब हमारा दिमाग शांत हो , उसमे कुछ विचार एवं विकार न हो।  
  • ध्यान सत्यता तक पहुंचने की विधि है , ना की कल्पनाये करने की , विविध प्रकार की कल्पनाये करके ध्यान कभी सार्थक नहीं होता।  उसके लिए मन का शांत होना अति आवश्यक है।









८.  समाधी - पूर्ण आत्मानुभव होना :       




  • समाधि अष्टांग योग का आखरी चरण है।  समाधी लगने पर साधक को पूर्ण समता प्राप्त हो जाती है। उसके लिए सब एकसमान हो जाता।  
  • उसे कुछ भी जानने के लिए शेष नहीं रह जाता और ना ही कुछ पाने के लिए।  
  • उसे शास्वत आनंद की प्राप्ति हो जाती है।  "समाधि " का आनंद तो वही जानता है जिसने समाधी लगायी हो।  उसका वर्णन तो कोई शाब्दिक रूप से कर ही नहीं सकता।  उसके लिए अनुभव करना आवश्यक है। 







इस लेख में आपने "अष्टांग योग क्या है , इसका आचरण कैसे करे ?" के बारे में जानकारी पढ़ी। अष्टांग योग या "राज योग" का जो मुख्य सारांश है ,वही आपतक पहुंचाने का प्रयास किया है।