Monday, January 20, 2020

उष्ट्रासन योग विधि ,लाभ एवं सावधानियां

योगशास्त्र में वर्णित उष्ट्रासन मध्यम स्तरीय पीछे झुकनेवाला आसन है। अंग्रेजी में इसे "Camel Pose" भी कहा जाता है। इस आसन को सरल कहना गलत नहीं होगा ,क्योंकि थोड़े दिनों के अभ्यास से ही ,साधक इस आसन  को साधने में सक्षम हो जाता है। संस्कृत शब्द "उष्ट्रासन" दो शब्दों का मेल है ,उष्ट्रा+आसन। संस्कृत भाषा में ऊंट को उष्ट्र कहा जाता है ,तथा बने रहने की स्थिति को, आसन शब्द से उल्लेखित किया गया है। इस आसन का अभ्यास करते समय शरीर की रचना ऊंट की तरह दिखाई देने लगती है ,इसीकारण यह आसन उष्ट्रासन के नाम से जाना जाता है। कुंडलिनी जागरण में अनाहत तथा विशुद्ध चक्र पर उष्ट्रासन का विशेष प्रभाव पड़ता है।


 Ustrasana In Hindi - उष्ट्रासन योग

 Ustrasana In Hindi - उष्ट्रासन योग






  1. उष्ट्रासन का अभ्यास किसी शांत और स्वच्छ जगह पर करे।
  2. सबसे पहले जमीन पर चटाई बिछाकर घुटनों के बल बैठ जाए।
  3. इस बात पर ध्यान देना चाहिए की आपके कंधे एवं घुटने एक सीधी रेखा बनाते हो।
  4. जब आप इस स्थिति में बैठते है ,तो आपके घुटनों से लेकर पैरों की उँगलियों तक का भाग फर्श से जुड़ा होना चाहिए।
  5. दोनों हाथों को अपने कूल्हों पर रखे। और श्वास को भरते हुए ,कूल्हों को थोड़ा आगे की और झुकाये।
  6. अपनी  नाभि को खींचते हुए , दोनों हाथों को ,कंधों के ऊपर से ले जाए और पैरों की एड़ियों को छूने का प्रयास करे।
  7. इस क्रिया को करते समय अपनी पीठ को कमान देकर पीछे की तरफ झुकने  प्रयास करे ।
  8. इस अवस्था में गर्दन सरलता से पीछे जाती है ,गर्दन को पीछे जाने दे और  तटस्थ बनाये रखने की कोशिश करे।
  9. श्वास को सामान्य गति से ले और इसी अवस्था में कम से कम 40 से 50 सेकंड तक बने रहे।
  10. नियमित अभ्यास करते हुए समय अवधि को १ मिनट या अपनी इच्छा अनुसार बढ़ा सकते है।
  11.  शुरुवाती समय में जो नए साधक है , या जो मोटापे से ग्रसित है ,उनके हाथ पैरों को नहीं छू पाते। तो इस स्थिति को सरल बनाने के लिए लकड़ी के क्यूब का सहारा ले सकते है।
  12. दो क्यूब लेकर अपने पैरों के पास रखे और क्यूब पर हाथों को रख "उष्ट्रासन" का अभ्यास करे।
  13. निरंतर अभ्यास से हाथ, पैरों तक पहुंच जाते है।
  14. अभ्यास  पूर्ण होने के बाद आप धनुरासन ,सर्वांगासन,वज्रासन,चक्रासन का अभ्यास कर सकते है।







 Health Benefits Of Ustrasana Pose - उष्ट्रासन के लाभ


  1.  इसका अभ्यास  शरीर को लचीला एवं ताकदवर बनाता है।
  2. इस आसन का प्रभाव विशेष कर नाभि पर पड़ता है ,जो ७२०००  नाड़ियों  का केंद्र है।
  3.  नियमित इस आसन के अभ्यास से पाचनतंत्र मजबूत बना रहता है तथा गैस ,कब्ज ,भूक ना लगना जैसी पेट की समस्याएं समाप्त हो जाती है।
  4. यह आसन छाती को फ़ैलाने तथा  मजबूत बनाने में मदद करता है।
  5. नित्य इसका अभ्यास पैर,कंधे तथा पीठ को मजबूत बनाकर, निचले हिस्से के दर्द को कम करता है।
  6. रोजाना "उष्ट्रासन" का अभ्यास करने से मेरुदंड लचीला एवं मजबूत बनाता है ,जिससे आप अपनी शारीरिक रचना को पहले ज्यादा सुंदर एवं उन्नत अवस्था में पाते है।
  7. महिलाओं की मासिक धर्म ,प्रदर रोग जैसी समस्याएं इस आसन के नियमित अभ्यास से समाप्त हो जाती है।
  8. थॉयरॉइड ,मधुमेह ,अस्थमा ,ब्रोकाइटिस ,मोटापा ,कोलायटिस ,डिप्सिसिया,प्रजनन प्रणाली की समस्या इत्यादि रोगों में "उष्ट्रासन योग "  चिकित्सक पद्धतिसे कार्य करता है ,इसलिए इन सभी समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों को अपने जीवन में  इस आसन को अवश्य स्थान देना चाहिए।
  9. कुंडलिनी में उपस्थित अनाहत यानि ह्रदय चक्र ,या  विशुद्ध चक्र को जागृत करने में यह आसन  मदद करता है।
  10. लंबे समय तक ध्यान की स्थिति बनाते समय मेरुदंड में झुकाव की स्थिति बनाने लगती है ,इसलिए ध्यान के बाद उष्ट्रासन का अभ्यास ,मेरुदंड को मजबूत तथा सक्रीय बनाये रखता है।
  11. यह आसन प्यास पर विजय दिलाने में सक्षम है ,इस आसन का अभ्यास करते समय साधक को अपना ध्यान ह्रदय में स्थित अनाहत चक्र पर या गले में स्थित विशुद्ध चक्र पर केंद्रित करना चाहिए।
  12. शरीर को सक्षम बनाते हुए ये आसन आत्मविश्वास ,कठोरता ,निर्भीकता ,तथा सहनशीलता जैसे गुणों को उजागर करता है।






Things To Know Before You Practice Ustrasana Pose - ध्यान देने  योग्य बातें






  • इस आसन का अभ्यास  करने से पहले ध्यान रखे की आपका पेट और आतें खाली हो। भोजन के बाद कम से कम ४ से ५ घंटे बाद ही उष्ट्रासन का अभ्यास करना चाहिये।
  • सुबह सूर्योदय के समय अन्य व्यायामों के साथ इस आसन को करना लाभकारी सिद्ध होता ही। पर किसी कारणवश सुबह इस आसन का अभ्यास ना कर पाएं ,तो शाम के समय इसका अभ्यास करना आपको चमत्कारिक परिणाम देगा।
  • इसका अभ्यास करने से पहले पीछे की और झुकने वाले आसनों का अभ्यास करे ,जिससे आप  सरलता के साथ उष्ट्रासन का अभ्यास कर पाएं।






Precautions For Ustrasana Yoga - उष्ट्रासन में सावधानी




  • उष्ट्रासन एक सरल और लाभदायी आसन है पर जिन्हे माइग्रेन या अनिद्रा की शिकायत है ,उन्हें इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।
  • कम या उच्च रक्तचाप की समस्या होनेपर भी इसका अभ्यास करने से बचना चाहिए।
  • कमर ,पीठ तथा गर्दन की समस्या या चोट होनेपर भी इस आसन को ना करे।
  • उष्ट्रासन का अभ्यास किसी योग्य गुरु या योग प्रशिक्षक की देखरेख में करना सबसे उत्तम है।







इस लेख में आप "उष्ट्रासन योग विधि ,लाभ एवं सावधानियां " के बारे में जान चुके है ,उष्ट्रासन  का अभ्यास निश्चित ही आपको आनंद की अनुभूति कराएगा।


Sunday, January 12, 2020

उपविष्ठ कोणासन कैसे करे ,इसके क्या लाभ है ?

संस्कृत : उपविष्ठ कोणासन ,उपविष्ठ - बैठे ,कोणासन - कोण मुद्रा

योग में वर्णित उपविष्ठ कोणासन शरीर को अच्छा खिंचाव  देता है।  यह बैठे आसनों में से एक बेहतरीन आसन है। इसका अभ्यास व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से उन मुद्राओं के लिए तैयार करता है ,जिनका अभ्यास बैठकर किया जाता है। इसका अभ्यास करते समय पैरों को फैलाया जाता है। एवं  मेरुदंड को आधारस्तंभ बनाकर धड़ को फर्श पर टिकाया जाता है। निचे "उपविष्ठ कोणासन" की सरल जानकारी देने जा रहे है ,जो आपके स्वास्थ के लिए उपयुक्त साबित होगी।



Upavistha Konasana Pose | उपविष्ठ कोणासन योग

Upavistha Konasana Pose | उपविष्ठ कोणासन योग





  1. इस आसन का अभ्यास किसी शांत जगह पर करे। 
  2. जमीन पर चटाई बिछाएं ,पैरों को सामने फैलाकर ,खड़े बैठ जाए। 
  3. मेरुदंड को सीधा रखे। पैरों को कंधों के समांतर फैलाये ,जिससे वो आपकी श्रोणि से ९० डिग्री का कोण बनाये।  
  4. ऐसी अवस्था में आपकी श्रोणि आरामदायक महसूस होनी चाहिए। दोनों हाथों को कूल्हों के पीछे जमीन पर टिका दे। 
  5. लंबी श्वास के साथ कमर को आगे की तरफ कमान दे और कंधों के किनारों को प्रसारित करे। कुछ समय इसी अवस्था में बने रहे। 
  6. धीरे धीरे हाथों को सामने की और ले जाए। एवं हाथों से दोनों तलवों को पकड़ ले। 
  7. तलवों को पकड़ते समय  केवल तलवों के मध्य भाग को पकड़ना है। इसके विपरीत अगर आप पैर के ऊपरी हिस्से या अंगूठे को पकड़ते है ,तो आगे झुकते समय कठिनाई हो सकती है। 
  8. श्वास छोड़ते हुए मेरुदंड को कमान दे। आगे बढे और ठोडी को फर्श पर टिकाएं। 
  9. श्वास गति को सामान्य बनाये रखे।
  10.  कम से कम १ मिनट तक आसन में बने रहे। 
  11. कुछ समय बाद श्वास लेते हुए पुनः सामान्य अवस्था में आ जाए। इस क्रिया को ३ से ४ बार दोहराये। 
  12. इस आसन का अभ्यास करते समय आप अपना ध्यान नाक के अग्रभाग पर ,भृकुटि के मध्य या श्वासों के आवागमन पर केंद्रित कर सकते है। 
 



Upavistha Konasana Benefits | उपविष्ठ कोणासन के लाभ


  1. नियमित इस आसन का अभ्यास कमर के निचले हिस्सों को एक बेहतरीन खिचाव देता है। 
  2. यह आपके पैर ,कंधों की मांसपेशियां ,कोहनियों को मजबूत बनाता है।
  3.  इसका अभ्यास जठराग्नि को प्रज्वलित कर भूक को बढ़ाता है।
  4.  पेट अंगों की मालिश कर पाचनक्षमता को सुदृढ़ बनाता है।
  5.  अनावश्यक चर्बी को दूर कर वजन कम करने में सहायक है।  
  6. छाती को चौड़ा कर फेफड़ों को स्वस्थ बनाये रखता है। 
  7. कमर को लचीला और आकर्षक बनाता है। 
  8. मेरुदंड को बल देता है तथा कटिस्नायुशील को दूर रखने में मदद करता है। 
  9. हार्मोन्स को नियंत्रित रखता है एवं पुरुषत्व को बढ़ाता है। 
  10. इसके नियमित अभ्यास से दिमाग शांत रहता है।
  11.  यह गुर्दों को स्वच्छ और निरोगी बनाये रखता है। 
  12. समस्त वायुविकार इसके नियमित अभ्यास से खत्म हो जाते है। 
  13. इसका अभ्यास साधक में सहनशीलता ,धैर्य ,साहस , दयाभाव को जगाता है। 
 

Begainner Tips | शुरुवात के लिए टिप्स 

  • शुरुवाती साधकों को ,जो पहली बार इसका अभ्यास करना चाहते है ,उनके लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण आसन साबित हो सकता है। 
  • यदि आप आगे झुकते समय तकलीफ महसूस करते है ,तो इससे बचने के लिए पैरों को घुटनों से थोड़ा झुकाया जा सकता है। 
  • श्रोणि को स्थिर एवं सहज रखने के लिए निचे तकिया या कंबल का प्रयोग करे।


Upavistha Konasana Precautions | उपविष्ठ कोणासन में सावधानी


  • यदि आप ऊसन्धि या रान नाड़ी की समस्या से पीड़ित है तो इस आसन का अभ्यास करने से बचे। 
  • यह आसन गर्भवती स्त्रियों के लिए नहीं है। 




Some Points You Need To Know | ध्यान रखने योग्य बातें 


  • सुबह ब्रम्हमुहूर्त में योगाभ्यास करना शरीर और आत्मा के लिए उपयुक्त माना जाता है। 
  • इस आसन का अभ्यास करने से पहले आपका पेट खाली होना आवश्यक है। 
  • किसी कारण अगर आप सुबह योगाभ्यास नहीं कर पाते , तो इसका अभ्यास आप शाम के समय भी कर सकते है। बस अपने अभ्यास और भोजन में ५ घंटे का अंतर् रखना याद रखे। 




ऊपर आपने "उपविष्ठ कोणासन" के बारे में जाना। नियमित अभ्यास के द्वारा इस आसन को साधा जा सकता है। यह आसन आपको साहस की पराकाष्ठा की अनुभूति कराएगा। क्या ये जानकारी उपयोगी थी ? आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में दे सकते है। इसे अपने साथियों के साथ शेयर करना ना भूले।

Thursday, January 2, 2020

क्यों है महावीर आसन विशेष ? जानिये इसकी विधि,लाभ और सावधानियां

संस्कृत : महाविरासन ,महावीर - पराक्रमी ,आसन - मुद्रा
योग में वर्णित महाविरासन एक योगासन है। पवनपुत्र हनुमान जो विशेषतः बल बुद्धि के देवता है , उनका एक नाम महावीर भी है। ठीक उन्ही की तरह यह आसन भी शक्ति का खजाना है। इसलिए यह महाविरासन के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इसे "मारुती आसन " के नाम से भी लोग जानते है। इसका अभ्यास साधक में शौर्य और पराक्रम की भावना को उजागर करता है।



Mahavir Asana | महाविरासन योग

Mahavir Asana | महाविरासन योग







  1. इस आसन का अभ्यास किसी शांत और एकांत जगह पर करे। जमीन पर चटाई बिछाकर सीधे खड़े हो जाए। 
  2. बाए पैर को एक से दो फिट पीछे ले जाकर ,पंजे को जमीन से सटाकर रखे। 
  3. दाहिने पैर को घुटने से मोड़ कर ,धड़ का झुकाव आगे की और रखे। जब आप ऐसा करते है तो आपका बाया पैर जो पीछे है ,उसे (जमीन से सटाकर ) स्थिर रखे। 
  4. धड़ को आगे झुकाते समय अपने मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी ) को कमान दे ,और अपनी छाती को  फुलाये। 
  5. अपने दोनों हाथों से मुट्ठी बांधे (अपने अंगूठे को अंदर दबाकर) दोनों हाथों को छाती से ८ से १० इंच आगे ले जाए। 
  6. एक लंबी श्वास लेकर , दोनों मुठियों को जोरदार दबाये और अपने गर्दन की मांसपेशियों को सख्त करे। श्वास बाहर छोड़ दे। 
  7. पुनः श्वास लेते हुए  पेट को फुलाये और धीरे-धीरे श्वास बाहर छोड़े। 
  8. इसप्रकार २ मिनट तक आसन में रहते हुए इस क्रिया को जारी रखे। 
  9. २ मिनट के बाद वापस सामान्य अवस्था में आकर कुछ देर विश्राम करे। 
  10. उपरोक्त क्रिया को अपने दूसरे पैर के साथ भी करे। इसीप्रकार पैरों को बदलकर ५-५ बार करे। 
  11. इस आसन का अभ्यास करते समय संपूर्ण शरीर को सजग और तान कर रखे। 
  12. मन में साहस और पराक्रम की दिव्य भावना को उजागर होने दे। 
  13. इस मुद्रा का अभ्यास करते समय साधक अपना ध्यान किसी एक बिंदु पर नहीं बल्कि संपूर्ण शरीर पर केंद्रित करता है। (संपूर्ण शरीर एवं आत्मा के प्रति सजग रहता है )
 




Mahavir Asana Benefit | महाविरासन के लाभ



  1. प्रतिदिन इस आसन का अभ्यास संपूर्ण शरीर को मजबूत रखता है। 
  2. इसके अभ्यास से प्राणवायु प्राकृतिक रूप से शरीर में प्रवाहित होती है। 
  3. यह फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढाकर छाती को चौड़ा एवं मजबूत बनाता है। 
  4. इसका नियमित अभ्यास मोटापे को दूर कर वजन कम करने में सहायक है।  
  5. यह कद को बढ़ाता है एवं शरीर को हल्का रखता है। 
  6. इसका नियमित अभ्यास शरीर में खून का  संचार बढ़ाता है ,और रक्त को शुद्ध करता है। 
  7. शारीरिक रचना में सुधार लाने के लिए यह अत्यंत फायदेमंद आसन है। 
  8. इसका अभ्यास जठराग्नि को प्रदीप्त कर पाचनतंत्र को विकसित करता है। 
  9. यह मंदाग्नि ,कमर दर्द ,वायुविकार ,अतिनिद्रा ,वीर्यविकार इत्यादि समस्याओं से छुटकारा दिलाता है। 
  10. नित्य इस आसन का अभ्यास व्यक्ति में धैर्य ,शक्ति ,साहस ,शौर्य जैसे गुणों को बढ़ाता है।




Some Point You Need To Know | ध्यान रखने योग्य बाते


  • इस आसन का अभ्यास खाली पेट करे। 
  • सुबह सूर्योदय के समय शुद्ध वायु प्रवाहित होती है। यह इस आसन के लिए उपयुक्त समय है।  
  • आप चाहे तो इसका अभ्यास अपने शाम के सत्र में भी कर सकते है। बस अपने पेट को कुछ खाली रखना याद रखे। जिससे आप सकारात्मक  ऊर्जा के साथ इस आसन का अभ्यास कर पाए।







Mahavir Asana Precautions | सावधानी


  • जिन्हे उच्च रक्तचाप या हृदयरोग की समस्याएं है ,वो इस आसन का अभ्यास ना करे।
  • गर्भवती स्त्रियों के लिए यह आसन नहीं है। 
  • अगर आपको कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक बिमारी है ,तो आपको इस आसन का अभ्यास करने से पूर्व अपने चिकित्सक (डॉक्टर) की सलाह लेना आवश्यक है।





इस  लेख में मैंने आपको "Mahavir Asana " के बारे में जानकारी दी। क्या यह जानकारी आपके लिए उपयुक्त थी ? आप अपनी प्रतिक्रिया कमेंट में दे सकते है। इसे अपने दोस्तों के साथ बांटना ना भूले। महाविरासन का अभ्यास जीवन में संयम ,धैर्य ,बल ,साहस ,स्वास्थ जैसे अनगिनत गुणों को  लेकर आता है। यह रचना आंजनेय हनुमानजी को समर्पित है ,जो बल ,बुद्धि और विद्या के स्वामी है।

Friday, December 20, 2019

क्यों है प्रार्थनासन का महत्व ? जानिए इसकी विधि

संस्कृत : प्रार्थनासन , प्रार्थना - याचना या दुआ करना ,आसन - मुद्रा
योग में वर्णित प्रार्थनासन एक सरल और लाभदायी योगासन है। संस्कृत भाषा में इस आसन को प्रणामासन के नाम से भी जाना जाता है।  पाश्चिमात्य संस्कृति में इसे "Pray Pose" के नाम से नामित किया गया है। प्रार्थना एक आसान तरिका है ,जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपना संदेश या मन की बात  ईश्वर तक पहुंचा सकता है। सूर्यनमस्कार की १२ स्थितियों का अभ्यास करते समय भी इस आसन का अभ्यास किया जाता है।  आप योग की शुरुवात करते समय या योगसत्र के अंतिम चरण में भी इस आसन का अभ्यास कर सकते है।



Prarthana Asana (Pray Pose) | प्रार्थनासन योग 

Prarthana Asana (Pray Pose) | प्रार्थनासन योग




  • प्रार्थनासन का अभ्यास दो विधियों द्वारा किया जाता है। प्रस्तुत दोनों विधियों में से आप किसी भी एक विधि का अभ्यास कर सकते है।


  • पहली विधि :

  1. जमीन पर चटाई बिछाकर सीधे खड़े हो जाए। 
  2. मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी ),छाती एवं गर्दन को सीधी रेखा में रखे। 
  3. ४ से ५ बार लंबी गहरी श्वास ले। 
  4. श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथों को कोहनी से मोड़कर छाती के बिच लेकर आये। 
  5. दोनों हथेलियों के तलवों को एक दूसरे के साथ जोड़ दे।
  6. जितनी देर इस अवस्था में रुकना संभव हो उतनी देर बने रहे। 
  7. इस विधि का अभ्यास करते समय अपने मन में ईश्वर के प्रति समर्पण और विश्वास की भावना रखनी चाहिए। एवं आँखों को बंद कर ईश्वर से मंगल कामना करनी चाहिए।



  • दूसरी विधि :



  1. प्रार्थनासन की दूसरी विधि का अभ्यास करने के लिए निचे चटाई बिछाकर सामान्य अवस्था में बैठ जाए। 
  2. दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर  ,एड़ियों एवं पंजो को जोड़ दे। 
  3. दोनों हाथों को सामने लाकर नमस्कार की मुद्रा में जोड़े। 
  4. कोहनियों को जाँघों पर रखे और हाथों की उँगलियों को ठोड़ी से सटाकर रखे। जिससे उँगलियों का ऊपरी भाग ठोड़ी से स्पर्श करता रहे।
  5. इसी अवस्था में बने रहे।  
  6.  आसन का अभ्यास करते समय श्वास को जितना संभव हो उतना गहरा और लंबा लेना चाहिए।



Prarthana Asana (Pray Pose) Benefit | प्रार्थनासन के लाभ 

Prarthana Asana (Pray Pose) Benefit | प्रार्थनासन के लाभ








  1. नियमित रूप से प्रार्थनासन का अभ्यास मन को शांति प्रदान करता है। 
  2. यह उत्तेजना को शांत कर दिमाग को ताजा एवं चिंतामुक्त करता है। 
  3. नित्य इसका अभ्यास उच्च रक्तचाप के रोगियों को आराम दिलाता है। 
  4. यह स्मरणशक्तिवर्धक है ,इसके अभ्यास से बुद्धि कुशाग्र और तेजस्वी बनती है। 
  5. इसका अभ्यास व्यक्ति के मनोमय कोष को प्रभावित करता है ,जिसके कारण पुरानी से पुरानी बीमारिया आसानी से दूर होने लगती है। 
  6. यह आसन धारणा शक्ति को बलवान बनाता है। 
  7. एकाग्रता क्षमता को बढ़ाता है। 
  8. खून में शुद्ध प्राणवायु का संचार करता है। 
  9. खून को बढाता है। 
  10. अनीमिया जैसी बीमारियों में लाभदायी है। 
  11. इसका अभ्यास व्यक्ति में समर्पण की भावना को बढ़ाता है। 
  12. मानसिक तनाव एवं अवसाद में फायदेमंद है।


Some Things You Need To Know | ध्यान रखने योग्य बाते

  • अन्य आसनों की तरह ही इस आसन का अभ्यास खाली पेट किया जाना चाहिए। 
  • सुबह सूर्योदय के समय इसका अभ्यास आपको सकारात्मक परिणाम दिलाता है। आप चाहे तो अपने योगसत्र की शुरुवात ही आप प्रार्थनासन से कर सकते है।


Prarthana Asana Precautions | प्रार्थनासन में सावधानी



  • प्रार्थनासन का अभ्यास किसी भी उम्र का व्यक्ति सरलता से कर सकता है।

आशा है आपको प्रार्थनासन और उसके महत्व के बारे में उपयुक्त जानकारी मिल चुकी होगी।  क्या यह जानकारी आपके लिए उपयोगी थी ? अपनी प्रतिक्रिया आप कमेंट बॉक्स में दे सकते है। इसे अपने दोस्तों एवं साथियों के साथ शेयर करना ना भूले।





Saturday, December 14, 2019

कटिचक्रासन कैसे करे ,इसके क्या लाभ है ?

संस्कृत: कटिचक्रासन ,कटी -कमर ,चक्र - पहिया ,आसन - मुद्रा
योग में वर्णित कटिचक्रासन एक सरल योगासन है। इसे हर कोई अपने स्वास्थ अनुसार कर सकता है। ये  एक सरल और चमत्कारी आसन है। इसका अभ्यास करते समय कमर को दोनों तरफ मोड़ा जाता है। इसीकारण यह कटिचक्रासन के नाम से प्रचलित है। अनावश्यक चर्बी से छुटकारा पाकर ,शरीर को लचीला बनाने के लिए इस आसन का अभ्यास आवश्यक है।


Katichakrasana Yoga | कटिचक्रासन योग


Katichakrasana Yoga | कटिचक्रासन योग







  1. इस आसन का अभ्यास किसी स्वच्छ और एकांत जगह पर करे। जमीन पर चटाई बिछाकर सीधे खड़े हो जाए। 
  2. अपने कंधों और मेरुदंड को सीधा तान कर रखे। 
  3. दोनों पैरों में कम से कम आधे से एक फिट का आवश्यक अंतर ले । 
  4. दोनों हाथों को कंधों के बराबर ऊपर उठाये। जिससे आपके  दोनों हाथ और कंधे एक सीधी रेखा बनाएंगे। 
  5. एक लंबी श्वास भरे और श्वास छोड़ते हुए अपनी दाहिनी और मुड़े।
  6. दाहिनी और मुड़ते समय इस बात का ध्यान रखे की, आपकी कमर के ऊपरी भाग को मोड़ना है। किसी भी अवस्था में अपने पैरों को अपनी जगह से ना हिलाये। 
  7. गर्दन को दाहिनी और मोड़कर रखे। 
  8. जितनी देर इस अवस्था में रुकना संभव हो उतनी देर श्वास को बाहर रोककर आसन में बने रहे। 
  9. कुछ देर बाद पुनः सामान्य अवस्था में आ जाए।
  10. इसी क्रम को अपने बायीं और से करे। 
  11. दिनभर में आप इसे १० से १५ बार दोहरा सकते है। 
  12. आसन के दौरान थकावट महसूस होनेपर कुछ देर विश्राम करे।
  13. इस मुद्रा का अभ्यास करते समय साधक अपना ध्यान रीढ़ का निचला हिस्सा या मूलाधार चक्र पर केंद्रित करता है।


Katichakrasana Benefit | कटिचक्रासन के लाभ



  1.  नियमित  इस आसन का अभ्यास शरीर को लचकदार एवं हल्का बनाता है। 
  2. इससे कमर आकर्षक और सुंदर दिखने लगती है। 
  3. यह शरीर में मौजूद अतिरिक्त वसा को दूर कर वजन कम करने में सहायक है।  
  4. इसके अभ्यास से आलस्य दूर होकर शरीर और दिमाग को तरोताजा करता है।  
  5. यह मेरुदंड से जुडी समस्त नाड़ियों को शुद्ध करता है। 
  6. मेरुदंड और कमर को मजबूती प्रदान करता है। 
  7. गर्दन एवं कंधों की मांसपेशियों को खोलता है। 
  8. नियमित रूप से इसका अभ्यास किया जाए, तो ये संपूर्ण शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन (शुद्धिकरण) करता है।
  9. पाचनक्षमता को मजबूत बनाकर भूक को बढ़ाता है। 
  10. यह कब्ज ,मंदाग्नि ,अम्लता ,तनाव ,मलावरोध ,हाइपोथॉयरॉइड जैसे रोगों में लाभदायक है।



Some Points You Need To Know | ध्यान रखने योग्य बातें



  • इस आसन का अभ्यास खाली पेट किया जाना चाहिए। 
  • सुबह सवेरे इसका अभ्यास करना सकारात्मक लाभ प्रदान करता है। 
  • आप चाहे तो शाम के समय भी इसका अभ्यास कर सकते है ,बस आपको अपने भोजन और अभ्यास के बिच ५ से ६ घंटे का समय छोड़ना आवश्यक है। 
  • जिससे आपका खाना आसानी से पच जाए और आप नई ऊर्जा के साथ कटिचक्रासन का अभ्यास कर सके।




Katichakrasana Precautions | कटिचक्रासन में सावधानी


  • यह आसन गर्भवती स्त्रियों के लिए नहीं है। 
  • इसके अलावा अगर आप हर्निया ,पेट या रीढ़ की सर्जरी या स्लिप डिस्क  से पीड़ित है तो भी इसका अभ्यास ना करे।




"कटिचक्रासन," योग की शुरुवात करने के लिए भी एक सरल और फायदेमंद आसन है। जिसे कोई भी, चाहे वो नया हो या अभ्यासक  हर कोई आसानी से कर सकता है। क्या यह लेख आपके लिए उपयोगी था ? आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दे। साथ ही लेख पसंद आनेपर अपने दोस्तों के साथ जरूर बाटे।

Sunday, December 8, 2019

गर्भासन क्यों है फायदेमंद , जानिए इसकी विधि

संस्कृत: गर्भासन ,गर्भ -भ्रूण ,आसन- मुद्रा
योग में वर्णित  "गर्भासन "  एक योगासन है। इसका अभ्यास करते समय व्यक्ति का शरीर भ्रूण (गर्भ में पलनेवाले  शिशु) की तरह दिखाई देता है। इसीकारण इसे गर्भासन के नाम से नामित किया गया है। इस आसन में संपूर्ण शरीर का वजन कूल्हों पर संतुलित किया जाता है। यह शरीर की संतुलन शक्ति को बढ़ाता है ,साथ ही उत्तेजना को शांत कर मस्तिक्ष को शांत रखता है।  प्रस्तुत लेख गर्भासन के संपूर्ण जानकारी पर आधारित है,जिसका अभ्यास आपके लिए फायदेमंद साबित होगा।

                      Garbhasana In Hindi | गर्भासन योग

Garbhasana In Hindi | गर्भासन योग





  1. इस आसन का अभ्यास किसी शांत और हवादार जगह पर करे। जमीन पर चटाई बिछाकर पद्मासन में बैठ जाए। 
  2. मेरुदंड (रीढ़  की हड्डी ) को सीधा रखे।
  3. अपने दोनों हाथों को  जाँघों और बछड़ों के बिच डाले। 
  4. दोनों हाथों की कोहनियों को ,बछड़ों की मांसपेशियों में चारों तरफ घुमाये। जिससे आपके हाथों को आसानी  से मोड़ा जा सके। 
  5. शरीर को अपने कूल्हों पर संतुलित करने के लिए , श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथों के साथ पैरों को ऊपर उठाये। 
  6. अपने दाहिने हाथ से अपना बाय कान पकडे।
  7. इसीतरह बाए हाथ से अपना दाहिना कान पकडे। 
  8. इस स्थिति में जीतनी देर संभव हो संतुलन बनाये रखे। 
  9. आसन के दौरान श्वास गति को सामान्य बनाये रखे। 
  10. सामन्य स्थिति में आने के लिए कानों को छोड़े और कम से कम ३-४ बार मुद्रा को दोहराये। 
  11. इस आसन का अभ्यास करते समय ,आप अपना ध्यान नाक के अग्रभाग या प्राकृतिक श्वास पर केंद्रित कर सकते है।



Garbhasana Benefit | गर्भासन के लाभ


  1. प्रतिदिन इस आसन का अभ्यास मस्तिक्ष की धमनियों को आराम पहुंचाता है। 
  2. यह उत्तेजना ,क्रोध ,मानसिक विकार ,अत्यधिक तनाव में फायदेमंद है। 
  3. एकाग्रता क्षमता को बढ़ाकर बुद्धि को ओजस्वी बनाता है।
  4. आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त कर ,आंतरिक ऊर्जा को बढ़ाता है। 
  5. इसका अभ्यास पेट की आंतरिक मांसपेशियों को मालिश कर उन्हें स्वस्थ बनाता है। 
  6. इससे भूक खुलकर लगती है। 
  7. मोटापा दूर कर वजन कम करने में सहायक है। 
  8. यह आपकी शारीरिक मुद्रा में सुधार लाने के लिए सर्वोत्तम आसन है। 
  9. समस्त मूत्रविकार ,शुक्रक्षय ,कमजोरी ,स्वप्नदोष ,शीघ्रपतन इत्यादि समस्याओं को दूर रखता है। 
  10. यह मुद्रा आपकी शारीरक एवं मानसिक संतुलन में वृद्धि करता है।
  11. इसका नियमित अभ्यास साधक में सहनशीलता ,लचक,धैर्य एवं स्थिरता जैसे गुणों को उजागर करता  है। 


Begainner Tips | शुरुवात के लिए कुछ टिप्स


  1. पहली बार इस आसन का अभ्यास करते समय बछड़ों की मांसपेशियों में हाथों को फ़साना कष्टदायी हो सकता है। 
  2. इसे आसन बनाने के लिए पहले २ से ३ हफ़्तों तक कुक्कुटासन और तुलासन का अभ्यास करना चाहिए। 
  3. जब आपका शरीर पूरी तरह संतुलित और तैयार हो, तभी गर्भासन का अभ्यास करे। 
  4. शुरुवात में पैरों को ऊपर उठाते समय संतुलन नहीं बन पाता इसलिए संतुलन बनने तक आप दीवार के सहारे इसका अभ्यास कर सकते है। 
  5. अगर अभ्यास करते समय हाथ कानों तक ना पहुंच पाए तो दोनों हाथों से नमस्कार मुद्रा बनाकर आसन का अभ्यास करे।



Some Things You Need To Know | ध्यान देने योग्य बाते

  • यह आसन खाली पेट करना आवश्यक है। 
  • सुबह योगसत्र के बिच इसका अभ्यास करना चमत्कारी परिणाम देता है। 
  • पर अगर आप शाम के समय योगाभ्यास करते है तो अपने भोजन और अभ्यास के बिच ४ से ५ घंटे का समय छोड़ना याद रखे।




Garbhasana Precautions | गर्भासन में सावधानी

  • जिन्हे कूल्हों पर कोई घाव या तकलीफ हो उन्हें इस आसन से बचना चाहिए। 
  • जो लोग बवासीर की समस्या से ग्रस्त है ,वो इसका अभ्यास ना करे। 
  • इस आसन में पारंगत होने के लिए पद्मासन में महारथ प्राप्त करना आवश्यक है ,जो पद्मासन नहीं लगा सकते या पद्मासन के समय पीड़ा का अनुभव करते है उन्हें आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।




आशा करते है की आपको गर्भासन की विधि , लाभ एवं आवश्यक जानकारी मिल चुकी होगी। क्या यह लेख आपके लिए उपयोगी था ? आप अपनी प्रतिक्रिया कमेंट के माध्यम से दे सकते है। गर्भासन  के अभ्यास के लिए धैर्य ,सहनशीलता और नियमितता का होना आवश्यक है। इन्ही तीन सीढ़ियों पर चलकर आप सफलता के शिखर तक पहुंच सकते है। लेख पसंद आनेपर इसे अपने स्नेही और मित्रों तक जरूर बाटें।

Wednesday, November 27, 2019

सिंहासन योग कैसे करे ,इसके क्या लाभ है ?

संस्कृत : सिंहासन ,सिंह - शेर ,आसन - मुद्रा
योग में वर्णित सिंहासन एक योगासन है। अंग्रेजी भाषा में ये आसन "Lion Pose"  के नाम से जाना जाता है। बाकी आसनों की तुलना में ये सबसे अलग और लाभदायी आसन है। जब कोई शेर जोर से गर्जना करता है, या दहाड़ता है। उसी तरह इस आसन का अभ्यास करते समय भी, व्यक्ति जोर से गर्जना करता है। अगर कोई इसे सही ढंग एवं एकाग्रता के साथ करता है ,तो उसकी शारीरिक रचना या चेहरे के  हाव-भाव बिलकुल उस शेर की तरह दिखाई देते है ,जो गर्जना कर रहा है।



Simhasana Yoga | सिंहासन योग

Simhasana Yoga | सिंहासन योग




  1. शुरुवात करने के लिए जमीन पर चटाई बिछाकर दंडासन ( पैरों को सामने फैलाकर ) में बैठ जाए। 
  2. कमर को सीधा रखे एवं हाथों को बगल में आराम करने दे । 
  3. अपने दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर बाई जांघ पर रखे। 
  4. एवं बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिनी जांघ पर रखे। इसे पद्मासन कहा जाता है। 
  5. इसी अवस्था में आगे बढे और हाथों को फर्श पर टिका दे। 
  6. जब आप ऐसा करते है तो आपकी बैठक जो पद्मासन की मुद्रा में है ,वो खड़ी हो जाती है। और केवल घुटनों पर ही संतुलन रहता है। 
  7. बैठक को सामने की तरफ झुकाये और कमर को हल्का सा मोडे। 
  8. एक लंबी एवं गहन श्वास लेकर जीभ को बाहर निकाले। 
  9. मुँह से श्वास को बाहर छोड़ते हुए जोर की गर्जना करे। जैसे किसी शेर की दहाड़ हो। 
  10. इसी अवस्था में रहते हुए उपरोक्त क्रिया को ५ से ६ बार करे। अभ्यास अनुसार इसे बढ़ाते जाए। 
  11. सिंहासन का अभ्यास करते समय आप अपना ध्यान मूलाधार स्थान या विशुद्ध चक्र पर केंद्रित कर सकते है।


Simhasana Benefits | सिंहासन के लाभ


  1. नियमित रूप से सिंहासन का अभ्यास आवाज को मधुर बनाता है। 
  2. इसका अभ्यास करते समय गले में विशिष्ट घर्षण होता है ,ये गले संबंधित संक्रमण एवं थॉयरॉइड से ग्रसित लोगों के लिए गुणकारी आसन है। 
  3. यह छाती को तनावरहित कर, फेफड़ों को निरोगी बनाये रखता है। 
  4. ये चेहरे को स्वस्थ और सुंदर बनाता है। 
  5. इसके अभ्यास से मूलबंध  ,जालंधर बंध  ,एवं उड्डियान बंध ये तीनों बंध सक्रिय होते है। 
  6. ये आसन समस्त वात ,पित्त और कफरोगों का नाशक है। 
  7. यह सभी श्वसन विकारों को दूर करने में सहायक आसन है। 
  8. आँखों के समस्त रोगों दूर करता है। 
  9. ये जीभ की रचना में सुधार करता है। 
  10. मुख संक्रमण ,मुख से दुर्गन्धि आना ,कब्ज ,पेट फूलना ,अपच ,जठराग्नि का मंद हो जाना ,छाती में जलन ,मध्यपट ,आँखों में जलन ,संग्रहण इत्यादि समस्याओं को जड़ से मिटता है। 
  11. इसके अभ्यास से व्यक्ति की श्वसन क्रिया में सुधार होता है। 
  12. ये दंत रोगों को दूर करने में सक्षम है। 
  13. इसका अभ्यास जबड़ों को स्वस्थ एवं फिट रखता है। 
  14. पीठ की समस्याओं में राहत देता है।



Beginner Tips | शुरू करने के लिए टिप्स


  • ये एक सरल योगासन है। फिर भी जिन्हे पद्मासन में बैठने में कठिनाई होती है ,वो इस आसन को सरल पद्धति से कर सकते है।
  •  सरल तरीके से इस आसन को करने के लिए वज्रासन की स्थिति में बैठ जाए। 
  • दोनों घुटनों को थोड़ा अलग करे। जिससे आप आसानी से अपने दोनों हाथ घुटनों के मध्य रख सके। 
  • दोनों हाथों को दोनों जाँघों के बिच रख दे। 
  • हथेलियों को रखते समय उन्हें उल्टा रखे ,जिससे उंगलिया आपकी और इंगित रहे। 
  • लंबी श्वास भरे और जींभ को बाहर निकाले। 
  • गर्जना करते हुए मुँह से श्वास को बाहर निकाले। इसप्रकार ५ से ७ बार करे।




Simhasana Precautions | सावधानी


  • इस आसन को आप सरलता से घर पर कर सकते है। इसका अभ्यास करने के लिए आपको किसी शिक्षक या गुरु की आवश्यकता नहीं है। 
  • मात्र इस बात का ध्यान रखे की ,अगर आप घुटने की किसी गंभीर चोट या समस्या से पीड़ित है। तो अभ्यास करते समय घुटनों को ना मोड़े।


ध्यान रखने योग्य बाते


  • इस आसन का अभ्यास खाली पेट किया जाना चाहिए। इसलिए सुबह सवेरे इसका अभ्यास करना उपयुक्त रहता है। क्योंकि इस समय आपका पेट खाली और मस्तिक्ष तनावरहित रहता है।
  •  पर  अगर आप समय नहीं निकाल पाते, तो शाम के समय भी आप इस आसन को कर सकते है ,बस भोजन और अभ्यास के बिच ५ घंटे का समय छोड़ना याद रखे।




अब आप "सिंहासन" की दोनों विधियों को जान चुके है। क्या आपको ये जानकारी उपयुक्त लगी ? अपनी राय आप कमेंट बॉक्स में दे सकते है।  इस जानकारी को अपने साथियों के साथ शेयर करना ना भूले।



Monday, November 25, 2019

सिद्धासन योग कैसे करे ,इसके क्या लाभ है ?

संस्कृत : सिध्दासन ,सिद्ध - निपुण ,आसन - मुद्रा
योग में वर्णित सिद्धासन  एक ध्यानात्मक योगासन है। इसे सभी योगासनों में श्रेष्ठ आसन के रूप में जाना जाता है। यह अनगिनत सिद्धियों को प्रदान करनेवाला तथा रोगों का शमन करनेवाला है ,इसीकारण इसे सिद्धासन के नाम से जाना जाता है। सामान्यतः इसका अभ्यास साधक ध्यान साधना या अन्य यौगिक क्रियाओं के समय करता है। ये आसन प्राणों को उर्ध्व बनाकर कुंडलिनी जागरण में सहायक है।




Siddhasana Yoga | सिद्धासन योग 

Siddhasana Yoga | सिद्धासन योग







  1. सिद्धासन का अभ्यास किसी शांत जगह पर किया जाना चाहिए। जिससे आप आसानी स्वयं से जुड़ पाए ,तथा  चित्त को स्थिर किया जा सके। 
  2. सबसे पहले जमीन पर चटाई बिछाकर दंडासन में ( पैरों को सामने फैलाकर ) बैठ जाए। 
  3. कमर को सीधा रखे। 
  4. बाए पैर को घुटने से मोडे  तथा एड़ी को गुदा एवं अंडकोष के बिच रखे। 
  5. ऐसा करते समय बाए पैर के तलवे को अपने दाहिने पैर के जांघ से सटा दे। 
  6. अब दाहिने पैर को घुटने से मोड़कर एड़ी को शिश्न के ऊपर दबाकर रखे। 
  7. ऐसा करते समय दाहिने पैर के तलवे को बायीं जांघ के आतंरिक भाग से सटाकर रखे। 
  8. दोनों हाथों को घुटनों पर रखे (आप हाथों को किसी भी मुद्रा में रख सकते है। ) मेरुदंड ,छाती एवं गर्दन को सीधा रखे और जालंधर बंध लगाए। 
  9. कुछ समय के लिए अपना ध्यान भृकुटि के मध्य केंद्रित करे। 
  10. कुछ देर बाद पुनः सामान्य अवस्था में आ जाये। 
  11. उपरोक्त  क्रिया को पैरों में बदलाव कर दोहराये। 



Siddhasana Benefits | सिद्धासन के लाभ



  1. सिद्धासन के नियमित अभ्यास से चित्त स्थिर होने लगता है। इसे सभी आसनों का स्वामी माना जाता  है ,इसलिए इसका अभ्यास करते हुए साधक किसी भी साधना को सरलता से सिद्ध कर सकता है। 
  2. यह शरीर की आतंरिक मांसपेशियों को प्रभावित कर उन्हें निपुणता प्रदान करता है। 
  3. नियमित इसके अभ्यास से जालंधर ,मूल ,तथा उड्डियान इन तीनों बंधों का अभ्यास अपने आप हो जाता है। 
  4. ये शरीर के सभी ७२००० ग्रंथियों का शुद्धिकरण करता है। 
  5. कामवासना पर विजय प्राप्त करने के लिए सिद्धासन सर्वोत्तम आसन है। 
  6. इसका नियमित अभ्यास चित्त को निष्पाप और स्थिर कर ब्रम्हचर्य बनाये रखता है। 
  7. पद्मासन लगाने से शरीर को होनेवाले सभी लाभ इस आसन से प्राप्त हो जाते है। 
  8. ये जठराग्नि को सक्रिय कर पाचनक्षमता को बढ़ाता है। 
  9. कब्ज ,अम्लता ,भूक न लगना ,थकान ,अनिद्रा ,अवसाद जैसी समस्याओं में कारीगर है। 
  10. इसके अभ्यास से मनुष्य अपने प्राकृतिक श्वास से जुड़ जाता है। ये दमा ,अस्थमा ,धाप लगना इत्यादि श्वसन विकारों से मुक्ति दिलाता है। 
  11. ज्वर,जीर्णज्वर,अजीर्ण ,ह्रुदयरोगों को दूर करने में सहायक है। 
  12. क्षयरोग जैसी घातक बीमारियों को चिकित्स्कीय रूप से दूर करता है। 
  13. प्लीहा की वृद्धि ,प्रमेह ,शुक्रक्षय ,वीर्यविकार जैसी घातक बीमारियों से मुक्ति दिलाता है।





Siddhasana Precautions | सिद्धासन में सावधानी

  • सिद्धासन का अभ्यास अत्याधिक समय तक करना आपको लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकता है। इसलिए इसका नियमित और निर्धारित समय तक ही अभ्यास करना चाहिए। 
  • इसके अलावा जो लोग घुटने ,जोड़ों का दर्द ,एवं हाथ -पैरों की जकड़न से ग्रसित है उन्हें इस आसन से बचना चाहिए। 
  • बवासीर से पीड़ित व्यक्ति या गुदा की किसी भी समस्या से पीड़ित होनेपर इसका अभ्यास ना करे। 
  • गंभीर पीठदर्द या स्लिप डिस्क की परेशानी होनेपर इस आसन से बचे।



ध्यान रखने योग बाते


  • इस आसन का अभ्यास आप दैनिक योगसत्र में या योगासनों के अंत में कर सकते है। इसलिए आवश्यक है की आपका पेट खाली हो। 
  • सुबह सवेरे इसका अभ्यास करना आपको सकारत्मक लाभों से अवगत कराएगा। आप चाहे तो इसे शाम के समय भी कर सकते है।







आशा है आपको " सिद्धासन " के बारे में उपयुक्त जानकारी प्राप्त हो चुकी होगी।  फिर भी कोई सवाल होनेपर आप कमेंट कर के पूछ सकते है। क्या आपको यह लेख उपयोगी लगता है ? आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में दे सकते है। जानकारी पसंद आनेपर इसे अपने मित्रों के साथ जरूर शेयर करे।

Wednesday, November 20, 2019

मयूरासन क्यों है विशेष ,जानिए इसकी विधि

मयूरासन को मोर पक्षी से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। इंग्लिश में यह आसन को Peacock Pose के नाम से भी जाना जाता है। यह आसन शरीर संतुलन की उन्नत अवस्था को दर्शाता है। मोर को प्रेम एवं अमरता का प्रतीक माना जाता है। मयूरासन का अभ्यास करते समय व्यक्ति की मुद्रा मोर की तरह दिखाई देती है। यह आसन करने में काफी जटिल दिखाई देता है ,परंतु नियमित अभ्यास करने से , इस आसन  में प्रवीणता हासिल की जा सकती है।

Mayurasana Yoga | मयूरासन योग

Mayurasana Yoga | मयूरासन योग
  •    मयूरासन  करने के लिए किसी स्वच्छ और हवादार जगह का चुनाव करे। 
  • सर्वप्रथम जमीन पर चटाई बिछाकर बैठ जाए। 
  •  घुटनों के बल बैठकर ,हाथों को जमीन पर रखे। 
  •  हाथों की कोहनियों को नाभि पर लगाकर ,हाथों को जमीन से सटाकर रखे। 
  •  दोनों  हथेलियों के सहारे ,घुटनो को सीधा कर ,शरीर का भार हथेलियों पर दे। 
  • शरीर को इसी अवस्था में संतुलित बनाये रखे।
  • यह आसन थोड़ा मुश्किल है ,इसलिए सावधानी से ही इसका अभ्यास करे।  
  • नियमित अभ्यास से इस आसन में संतुलन बनता  है। 
  • सर्वप्रथम जब भी आप इसे करे, तो संतुलन आने तक किसी गद्दे पर या नरम स्थान पर ही  अभ्यास करे। 
  • संतुलन आ जाने पर आप इसे आसानी से जमीन पर कर पाएंगे। मयूरासन के अभ्यास के बाद आप बालासन का अभ्यास कर सकते है।



Benefits Of Mayurasana Yoga | मयूरासन के लाभ 


  • मयूरासन के नियमित अभ्यास से हाथ ,कंधे और पैरों की मासपेशिया मजबूत बनती है। 
  • रोजाना मयूरासन करने से अपच ,मंदाग्नि , गैस ,वात विकार दूर होकर पेट साफ़ होता है। 
  • साथ ही यह आसन रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास कर ,भूक को बढाता है। 
  • ये आसन नेत्रों की ज्योति बढ़ाकर, आँखे तेज और चमकदार बनाता है। 
  • मधुमेह ,थॉयरॉइड जैसी समस्याओं से पीड़ित लोगों को मयूरासन का लाभ अवश्य लेना चाहिए। 
  • नियमित मयूरासन का अभ्यास चेहरे पर आये दाग धब्बों को दूर कर चेहरे की सुंदरता को बढ़ाता है । 
  • इस आसन को नियमित करने से चेहरा तेजस्वी एवं चमकदार दीखता है। 
  • मयूरासन का नियमित अभ्यास करने वाले साधक की स्मरणशक्ति असामान्य होती है। 
  • इसका अभ्यास  मन को शांत एवं स्थिर बनाता है।  
  • महिलाये इस आसन का लाभ जरूर ले ,इससे महिलाओं के समस्त रोगों का निवारण हो जाता है। 



Precautions Of Mayurasana | मयूरासन में सावधानी 


  • मयूरासन  का अभ्यास सुबह सूर्योदय के समय खाली पेट करना उपयुक्त है। 
  • शाम के समय मयूरासन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान रखे की भोजन और अभ्यास के बिच कम से कम ६ से ७ घंटे का अंतर् अवश्य हो। 
  • जिन्हे कंधे ,कमर और छाती की शिकायत है उन्हें इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। 
  • जो महिलाये गर्भवती है उन्हें भी इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। 
  • साथ ही ह्रदय रोग ,उच्च रक्तचाप ,हर्निया जैसी बीमारियों से ग्रसित होनेपर भी इस आसन का अभ्यास ना करे। 




आशा है आपको "मयूरासन " के बारे में उपयुक्त जानकारी मिल गयी होगी। अगर कोई सवाल हो तो आप कमेंट कर के पूछ सकते है।